सदस्य बनिए
(मुखाकृति वेबदैनिकी)
ranvijay singh
Upendra Rai
|
इंदिरा जी के फैसलों में होती थी हिम्मत प्रकाशित: Wed, 18 Nov 2009 at 17:48 IST (Ramesh Chandra) जयंती 19 नवंबर पर विशेष
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक निडर नेता थीं जिन्होंने परिणामों की परवाह किये बिना कई बार ऐसे साहसी फैसले किये, जिनका पूरे देश को लाभ मिला और उनके कुछ ऐसे भी निर्णय रहे जिनका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा। उनके प्रशंसक और विरोधी, सभी यह मानते हैं कि वह कभी फैसले लेने में पीछे नहीं रहती थीं और जनता की नब्ज समझने की उनमें विलक्षण क्षमता थी। उनके समकालीन नेताओं के अनुसार बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवी पर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना, बांग्लादेश के गठन में मदद देना और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को राजनयिक दांव पेंच में मात देने जैसे तमाम फैसले और कदम इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में मौजूद निडरता के परिचायक थे। साथ ही आपातकाल की घोषणा, लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में डालना, आपरेशन ब्लू स्टार जैसे कुछ निर्णयों के कारण उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लाल बहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा को शुरू में ‘गूंगी गुडिया' की उपाधि दी गयी थी। लेकिन 1966 से 1977 और 1980 से 1984 के दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा ने अपने साहसी फैसलों के कारण साबित कर दिया कि वह एक बुलंद शख्यिसत की मालिक हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री वसंत साठे बताते हैं कि इंदिरा गांधी का यह विलक्षण गुण था कि वह लोगों की भीड़, भले ही वह नाराज ही क्यों न हो, में जाने से बिल्कुल नहीं घबराती थीं। भीड़ की नब्ज पहचानने की उनमें जबर्दस्त क्षमता थी। उन्होंने कहा कि एक बार इंदिरा ने मुझसे कहा था कि वह भीड़ के बीच जाकर ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं क्योंकि भीड़ ही उनका सुरक्षा कवच बन जाती है। जनता पार्टी सरकार के शासनकाल में इंदिरा की सुरक्षा बिल्कुल हटा ली गयी थी,लेकिन वह उस दौरान लगभग पूरे देश में घूमीं। साठे ने उड़ीसा में श्रीमती गांधी के साथ हुई एक घटना को याद करते हुए बताया कि कुछ लोगों ने एक जनसभा में उन पर पथराव किया। एक पत्थर उनकी नाक पर लगा और खून बहने लगा। उन्होंने कहा कि इस घटना के बावजूद इंदिरा गांधी का हौसला कम नहीं हुआ। वह वापस दिल्ली आयीं। नाक का उपचार करवाया और तीन चार दिन बाद वह अपनी चोटिल नाक के साथ फिर चुनाव प्रचार के लिए उड़ीसा पहुंच गयीं। उनके इस हौंसले के कारण कांग्रेस को उड़ीसा के चुनाव में काफी लाभ मिला। पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय कहते हैं कि इंदिराजी के हर फैसले में हिम्मत और बेबाकी झलकती थी। वह भीड़ में जनता के बीच यूं ही चली जाया करती थीं। वह जब तक रहीं उन्होंने यह परवाह नहीं की कि उनके किसी कदम से उनकी जान को खतरा हो सकता है। वर्ष 1959-60 में इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनी थीं। उस दौरान वह एक बार आम सभा के लिये इलाहाबाद आयीं। कई लोग उनसे मिलने के इच्छुक थे। उन्होंने इसका ध्यान रखा और आम सभा के बाद अचानक लोगों के बीच चली गयीं। उन्हें इसकी कभी हिचक नहीं रही और न ही उन्होंने अपनी जान की कभी परवाह की। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा का जन्म इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी वानर सेना बनाई और सेनानियों के साथ काम किया। जब वह लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं तो वहां आजादी समर्थक ‘इंडिया लीग' की सदस्य बनीं। भारत लौटने पर उनका विवाह फिरोज गांधी से हुआ। वर्ष 1959 में ही उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। नेहरू के निधन के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा ने उनके अनुरोध पर चुनाव लड़ा और सूचना तथा प्रसारण मंत्री बनीं। वह वर्ष 1966 से 1977 और 1980 से 1984 के बीच प्रधानमंत्री रहीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वह सिख अलगाववादियों के निशाने पर थीं। इकतीस अक्तूबर 1984 को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी। - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - |













Click Image to Enlarge
