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(मुखाकृति वेबदैनिकी)
- sanjeev srivastava
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Upendra Rai
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इंदिरा जी का निक्सन भी मानते थे लोहा प्रकाशित: Sat, 31 Oct 2009 at 17:35 IST (Ramesh Chandra) पुण्यतिथि 31 अक्टूबर पर विशेष
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपने कुशल नेतृत्व से देश को जीत दिलाई और उनकी कूटनीति की बदौलत बांग्लादेश का गठन हुआ। अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर उनकी पकड़ इतनी जबर्दस्त थी कि उस युद्ध के मामले में महाशक्ति देश अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को भी मुंह की खानी पड़ी। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के अनुसार भारत-पाक युद्ध में इंदिरा गांधी के सही समय पर किये फैसलों के कारण जंग में हस्तक्षेप करने के अमेरिका के मनसूबों पर पानी फिर गया। उस दौरान अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े के पहुंचने से पहले बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। इस तरह अमेरिकी सामरिक नीति को भारत ने करारा झटका दिया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध के दौरान बेहद धर्य से काम लिया। उन्होंने इस मामले में पहले अंतरराष्ट्रीय जनमत को इस बात के लिए संतुष्ट किया कि भारत के लिए यह युद्ध क्यों जरूरी हो गया था। लाखों बांग्लादेशी शरणार्थियों को करीब एक वर्ष तक देश में पनाह देना भी कोई आसान काम नहीं था। इस बीच इंदिरा गांधी ने यूरोप तथा अमेरिका की यात्राएं कीं। पश्चिमी देशों को भारत में उत्पन्न स्थिति से अवगत कराया। यूरोप ही नहीं, अमेरिका में भी उदारवादी चिंतकों और लोगों का एक वर्ग इससे संतुष्ट हो गया कि तब के पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर हाहाकार मचा था और मानवाधिकार हनन हो रहा था। यह श्रीमती गांधी की यह कूटनीतिक सफलता रही कि अमेरिकी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन की नीतियों का विरोध कर बांग्लादेश के बारे में भारत की नीतियों का समर्थन किया। इंदिरा गांधी के पूर्व मंत्रिमंडल सहयोगी वसंत साठे ने निक्सन के साथ उनके संबंधों का स्मरण करते हुए बताया कि वह 1970 में संयुक्त राष्ट्र के रजत जयंती समारोह में भाग लेने गये थे। इसके बाद विश्व निकाय की महासभा हुई। प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी उसे संबोधित करने गयीं। साठे ने बताया कि प्राय: ऐसा होता है कि भारत का प्रधानमंत्री जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए न्यूयार्क जाता है तो वह वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति से भी मिलता है। लेकिन साठे के अनुसार उस दौरे में इंदिरा ने निक्सन से मुलाकात नहीं की । साठे कहते हैं, ‘इससे पता चलता है कि इंदिरा गांधी कितने मजबूत इरादे वाली नेता थीं।'भारत-पाक युद्ध में इंदिरा ने अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े को हस्तक्षेप का मौका ही नहीं दिया। इससे पहले एक और दिलचस्प घटना हुई जिसमें इंदिरा के राजनय कौशल के कारण निक्सन की अमेरिकी प्रेस में काफी किरकिरी हुई। विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी सरकार अपना सातवां बेड़ा भेजने का मन बना रही है, यह बात जब इंदिरा को पता चली तो उन्होंने यह सूचना अमेरिका में तत्कालीन भारतीय राजदूत एल एन झा को भिजवा दी।विशेषज्ञ कहते हैं कि तब झा ने इस सूचना की अमेरिकी विदेश विभाग से पुष्टि करवायी। विदेश विभाग का जवाब था कि वह न तो इसकी पुष्टि कर सकता है और न ही इसका खंडन। झा ने इस अस्पष्टता का लाभ उठाया। तुरंत संवाददाता सम्मेलन बुलाया गया। इसमें उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश विभाग ने नौसेना का सातवां बेड़ा भेजने की संभावना से इनकार नहीं किया है। उनके इस बयान से अमेरिकी प्रेस में भारी बहस छिड़ गयी। अमेरिकी जनमत का एक बड़ा वर्ग वियतनाम युद्ध को लेकर पहले ही सरकार की नीतियों का भारी विरोधी था। अब यह सूरत बनने लगी कि अमेरिका भारत..पाक युद्ध में हस्तक्षेप कर सकता है। भारतीय राजदूत की इस सूचना से मीडिया में निक्सन सरकार की नीतियों की आलोचना शुरू हो गयी। निश्चित तौर पर भारत को इसका लाभ मिला। - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - |













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