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(मुखाकृति वेबदैनिकी)
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Upendra Rai
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हमेशा आशावान रहने वाले रचनाकार थे रांगेय राघव प्रकाशित: Fri, 11 Sep 2009 at 20:45 IST (Ramesh Chandra) Tags: चनाकार रांगेय राघव , पुण्यतिथि पुण्यतिथि 12 सितंबर पर विशेष
हिन्दी साहित्य में रांगेय राघव एक ऐसे लोकप्रिय रचनाकार रहे जिन्होंने प्रगतिशील नजरिये के बावजूद अपनी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं और प्रेम को बखूबी शामिल किया और हमेशा जिजीविषा भरे चरित्रों को महत्व दिया। आलोचकों के अनुसार रांगेय राघव की रचनाओं में समाज को व्यापक कैनवास पर पेश किया जाता है, लिहाजा उसके कमजोर पक्ष भी खुलकर सामने आते हैं। हिन्दी साहित्य में उनकी आंचलिक रचनाओं का भी विशिष्ट स्थान है। रांगेय राघव एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने इतिहास, समाज विज्ञान और पौराणिक आख्यानों का अपनी रचनाओं में बखूबी इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहानी उपन्यास, निबंध, नाटक, रिपोर्ताज सहित कई विधाओं में लिखा। जिस समय रांगेय राघव अपनी रचनाएं लिख रहे थे उस दौर में उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उन्हें किसी अंचल विशेष से जोड़कर देखा जायेगा। बाद में आलोचकों और समीक्षकों ने उन्हें आंचलिकता के सांचे में रख दिया। रांगेय राघव की मित्र मंडली उनका यह कहकर मजाक बनाती थी कि वह सुबह आधा किलो कागज लेकर बैठते हैं और रात तक उन्हें अपने लेखन से भर देते हैं। रांगेय राघव की कहानियों और उपन्यासों में उनके चरित्रों विशेषकर मजबूत महिला चरित्रों की जिजीविषा बेहद आकर्षित करती है। इस मामले में ‘गदल' के चरित्र को भुलाया नहीं जा सकता। रांगेय राघव प्रगतिशील नजरिये के रचनाकार होने के बावजूद उन्होंने अपने साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और प्रेम को शामिल किया। उन्होंने एक मायने में प्रगतिशीलता के दायरे का विस्तार किया। राघव की रचनाओं में प्रेमचंद की सतर्क दृष्टि और शरतचंद्र की मानवीय संवेदना को पेश करने वाली शैली का अद्भुत मेल दिखायी देता है। उनके साहित्य में कला और प्रगतिशीलता का अलग संश्लेषण दिखायी देता है। रांगेय राघव के साहित्य की लोकप्रियता उनके लिए एक मायने में सही साबित नहीं हुई क्योंकि उनकी कृतियों का आज तक ढंग से मूल्यांकन नहीं हो पाया। राघव का उपन्यास ‘ कब तक पुकारूं ‘ हिन्दी साहित्य के चंद उत्कृष्ट उपन्यासों में शामिल किया जाता है। रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ। उन्होंने अपने समय में आगरा के सेंट जोन्स कालेज से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और पीएचडी की। वह हिंदी के साथ ही अंग्रेजी, संस्कृत और मथुरा,आगरा की ब्रज भाषा के जानकार थे। रांगेय राघव का कलम से नाता कितना गहरा था, यह इसी तथ्य से समभा जा सकता है कि उन्होंने महज 13 वर्ष की उम्र में कहानियां लिखनी शुरू कीं और 19वें वर्ष में बंगाल के अकाल पर ‘तूफानों के बीच' लिखकर साहित्य जगत में खलबली मचा दी। वह कुल जमा 39 वर्ष ही जिये पर दुनिया से रूखसत होने से पहले 150 किताबें और करीब 90 कहानियां अपने नाम कर चुके थे। उन्होंने 39 वर्ष के अपने जीवन में उपन्यास, कहानियां, नाटक, रिपोर्ताज और कला तथा संस्कृति पर साहित्यिक आलोचनाएं लिखीं। विविध क्षेत्रों में अपने लेखन को उन्होंने कुल 150 पुस्तकों में समेटा। मुर्दो का टीला, सीधा सादा रास्ता, विषादमठ, परिवर्तन उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं। वह वर्ष 1947 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, वर्ष 1954 में डालमिया पुरस्कार, वर्ष 1957 और 1959 में उत्तर प्रदेश सरकार का पुरस्कार और 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए। 1966 में मरणोपरांत उन्हें महात्मा गांधी पुरस्कार दिया गया। वर्ष 1984 के बाद दूरदर्शन पर हर रविवार साहित्यिक कृतियों पर आधारित धारावाहिक प्रसारित होते थे। इनमें रांगेय राघव की पुस्तक ‘कब तक पुकारूं' पर आधारित धारावाहिक भी था जो काफी पसंद किया गया। राघव की प्रतिभा का एक अन्य पक्ष नाटकों का अनुवाद था। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध नाटककार शेक्सपीयर के कई लोकप्रिय नाटकों का हिन्दी में अनुवाद करने का एक बड़ा काम किया। लंबी बीमारी के बाद मुंबई में 12 सितंबर 1962 को उनका निधन हो गया। - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - |













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