Payal Khare    RSS
Delhi, India
Archives
सदस्य बनिए

Published: Thu, 01 Oct 2009
कहते हैं दूसरों की गलतियों से सीख लेनी चाहिए| और आज के नेता सीख ले रहे हैं महात्मा गाँधी की गलती से | देश से पहले अपने बारे में सोच रहे हैं| जो थोडे कम समझदार हैं, वो देश के बारे भी थोडा सोच लेते हैं| अब आप कहेंगे महात्मा ने ऐसी कौन सी गलती कर दी? अरे, एक देश को अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर देना और वहां के लोगों के के उत्थान के लिए हर मुश्किल से लड़ जाना, यह गाँधी की गलती ही नहीं, बेवकूफी भी तो थी| वर्ना अपने राष्ट्रपिता की हम वैसी बेकद्री थोड़ी ना करते, जैसी एक आम पिता की भी नहीं होती| गाँधी को यह हमारी सजा ही तो है, कि हम उनकी निजी वस्तुएं को राष्ट्रीय धरोहर की तरह संजो कर नहीं रखना चाहते और उन्हें बेच कर पैसा इकट्ठा कर रहे हैं| वो और बात है कि, हर कोई उन्हें खरीद नहीं पा रहा| ऐसा भी इसलिए नहीं है क्योंकि वो हमारे लिए अनमोल हैं, पर इसलिए क्योंकि हर कोई उनका मोल नहीं लगा सकता- ऊँचे दामों पर नीलामी जो हो रही है उनकी | नीलामी भी शायद उस गाँधी की नहीं हो रही जिसने कभी हमें आज़ादी दिलाई थी, बल्कि उस गाँधी की हो रही है जो आज़ादी दिलाकर एक इंटरनेशनल ब्रांड बन गया था| अच्छा ही है, ड्राइंगरूम में दुर्लभ जानवरों की खाल का चलन अब कॉमन भी तो हो गया है ! वही साउथ अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में गांधी के घर की बात अलग है| जिस घर में गाँधी ने तीन साल गुजारे, उस घर में रहने को कोई तीन मिनट भी तैयार नहीं लगता | शायद प्रोपर्टी खरीदने के लिए यह "बेस्ट लोकेशन" नहीं है! और आखिरकार "तरस" आया भी तो एक व्यवसायी को, शायद सरकार महंगाई कम करने में बहुत व्यस्त है!
जो यहाँ "कर्म करो और फल की चिंता छोडो" का तर्क देते हैं, उन्हें आज के दौर के लिए ज़रूरी "वर्क नोट जस्ट हार्ड, बट आल्सो स्मार्ट" का फन्डा याद रखना चाहिए | सिर्फ करना ही नहीं, उसका कुछ असर होना भी ज़रूरी है| गाँधी का अनुसरण हम करें या न करें, पर उनका योगदान इस तरह भुलाए जाना तो कतई | और वैसे भी, गाँधी अगर जिंदा होते भी तो हमारी इस बेरुखी पर उनकी नम्रता उन्हें कुछ बोलने नहीं देती!
वैसे, गाँधी की चीज़ों के साथ साथ उनकी सोच भी दर दर भटक रही है| पर उसे अन्दर बुलाने वाले घर ज़रा कम रह गए हैं| जो सहारा देते भी हैं, वो उसे वास्तविकता की अल्मारी में रखकर भूल जाते हैं| पर हमें परेशान होने की ज़रुरत नहीं है| गाँधी की सोच को "अगेंस्ट" में ही सही पर कौलजेस की वैचारिक बहस में जगह मिलती ही रहेगी | कितने गर्व की बात है कि आज हम समलैंगिकता और वोटिंग के कानून को आजाद करने के बारे में सोच सकते हैं | पर कितनी शर्म की बात है की जिसने हमें यह अधिकार दिलाया, आज हम उसे भूल चुके हैं | अपने राष्ट्रपिता को हम सिर्फ तब याद करते हैं जब कोई मुन्नाभाई उनका नाम फिल्म में लेता है या कोई गेस्टड हौलिडे पर ऑफिस बंद होता है | गांधी के प्रति हमारी यह श्रद्धा भी महज़ ३- ४ घंटो की होती है ! वैसे कुछ याद है कि २ अक्टूबर को गाँधी का जन्म हुआ था या निधन!
आज हम ज़रा-ज़रा से मुद्दों पर विधान सभा से लेकर सड़क तक आवाज़ उठाते हैं| कितनी अजीब बात है की हमारा यह लोकतंत्र तब ख़त्म हो जाता है, जब बात महात्मा गाँधी जैसे आउटडेटेड मुद्दों की हो | क्या गलत है, अगर कोई नेता अपनी छवि को यादगार बनाने के लिए अपनी ही मूर्तियों को बेशर्मी से हर जगह लगवा रहा हो? या कोई प्रशंसा का लालची नेता, विकास के नाम पर किसानो की ज़मीन पर फैक्ट्री बनाने का प्रस्ताव रखे? इंडिया और भारत का फर्क दूर करने का दावा करने वाले नेताओं को समझना होगा कि, इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि, पहले इंडिया, इंडिया और भारत भारत के तौर पर ही, बचे तो रहे |
और नेताओं की फितरत पर अगर हम भरोसा नहीं कर सकते, तो हमे ही यह समझना होगा कि इस तरह तो एक दिन गाँधी का नाम-ओ-निशान इस मुल्क से मिट जायेगा | तब अगर स्कूली किताबों में महात्मा गाँधी का नाम कही दिख गया, तो उनके बारे में न पढने, न पढाने वाले को कोई अंदाजा होगा ! जिस लापरवाही से हम अपनी विरासत खो रहे हैं, उस से तो यही लगता है कि, शायद एक दिन फिर हम पहले की तरह किसी के गुलाम होंगे..फर्क बस इतना होगा कि, तब कोई गाँधी बुलाने पर भी नहीं आएगा!
-पायल खरे (payalkhare.blogspot.com)

टिप्पणी लिखें :

नाम :
ईमेल पता :

टिप्पणियाँ (0)


No Comments Yet.!