Upendra Rai    RSS
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Published: Tue, 02 Feb 2010
छोटा है तो बेहतर ही होगा, ये तर्क हमेशा सही नहीं हो सकता है। राज्यों के मामले में तो बिल्कुल नहीं। राज्य छोटे हों या बड़े- उनके विकास का साइज से कोई लेना-देना नहीं है। छोटा सा हरियाणा कई राज्यों पर भारी पड़ता है तो बड़ा महाराष्ट्र या तमिलनाडु लगातार नई ऊंचाइयां छू ही रहे हैं। दूसरी आ॓र, उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा होने के बावजूद कभी भी देश की विकास यात्रा की अगुआई नहीं कर पाया जबकि गोवा छोटा होने के बावजूद टूरिज्म से अलग अपना जहान नहीं बना पाया। क्या गारंटी है कि छोटे राज्यों में शिक्षक छात्रों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देंगे? क्या गारंटी है कि छोटे राज्यों में टैक्स बाबू ईमानदारी से टैक्स वसूलेंगे? क्या गारंटी है कि छोटे राज्यों में औघोगिक विकास ज्यादा तेजी से होगा? क्या गारंटी है कि छोटे राज्यों में नेता जनता की भावनाओं को ज्यादा तरजीह देंगे? क्या गारंटी है कि छोटे राज्यों में भ्रष्टाचार कम होगा? उल्टे, मधु कोड़ा के मामले ने साबित कर दिया है कि मीडिया की नजर से दूर छोटे राज्यों में मलाई काटना ज्यादा आसान है। सवाल यह है कि क्या आंध्र प्रदेश को बांटकर अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग महज एक लालच है? क्या तेलंगाना के मुखर समर्थक राजनीति में अपनी हस्ती बढ़ाने में तो नहीं लगे है? उन्हें मालूम है कि आंध्र प्रदेश नहीं बंटता है तो उनका राजनीतिक कद छोटा ही रहेगा, उनकी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और जनता की ‘सेवा’ करने का उन्हें मौका नहीं मिलेगा। तेलंगाना के समर्थक कई तर्क देते हैं। उनका सबसे बड़ा तर्क है कि आंध्र प्रदेश बढ़ रहा है लेकिन तेलंगाना को इसका फायदा नहीं हो रहा है। राज्य में आत्महत्या करने वाले किसानों में सबसे बड़ी तादाद तेलंगानावासियों की ही है। तेलंगाना क्षेत्र में दो बड़ी बिजली परियोजनाएं हैं, कई सिंचाई के प्रोजेक्ट्स हैं- लेकिन बिजली और पानी का फायदा राज्य के दूसरे इलाकों को ही मिलता है। तेलंगाना इलाके में चंद लोगों के पास ही जमीन का मालिकाना हक है। इलाके की बड़ी आबादी के पास न तो जमीन है और न ही रोजगार के बड़े साधन। उनके पास बस हैदराबाद है, और कुछ नहीं। अलग राज्य बनाकर वो हैदराबाद के सहारे विकास की पटरी पर तेजी से बढ़ना चाहते हैं। तेलंगाना के समर्थकों के तर्क में दम है। विकास के लिए बिजली और पानी तो चाहिए ही। ऐसा शहर भी चाहिए जहां निवेशक बिना झिझक के निवेश कर सकें। हैदराबाद के रूप में तेलंगाना के पास ऐसा शहर है (अगर तेलंगाना के हिस्से में हैदराबाद आता है) जहां बिल गेट्स से लेकर अजीम प्रेमजी तक को निवेश करने में संकोच नहीं है। लेकिन हैदराबाद की लाचारी है। शहर की तरक्की के पीछे सर्विस सेक्टर का हाथ रहा है। हम सभी जानते हैं कि सर्विस सेक्टर बहुत मोबाइल होता है। मतलब यह कि जहां माहौल अच्छा दिखा, निवेश वहीं होगा। इसीलिए हैदराबाद आंध्र प्रदेश की राजधानी हो या फिर तेलंगाना की, निवेशक को आकर्षित करने के लिए इसका ब्रांड बनाए रखना जरूरी होगा। तेलंगाना को तेजी से विकास के रास्ते पर दौड़ने के लिए सबसे जरूरी होगा- केंद्र से करोड़ों-अरबों रूपये की मदद। बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य- सबके लिए अरबों रूपये चाहिए जो तेलंगाना के पास नहीं होगा। तो सवाल यह है कि क्या आंध्र प्रदेश का हिस्सा रहते हुए भी तेलंगाना का तेजी से विकास संभव नहीं है? मेरा विरोध छोटे राज्य बनने से नहीं है। तेलंगाना बनने से मुझे कोई ऐतराज नहीं है। प्रशासनिक बेहतरी और विकास के लिए देश को अगर 50 राज्यों में भी बांट दिया जाता है तो सही है। लेकिन मेरा विरोध उस तर्क से है जिसके मुताबिक छोटे राज्य बना देना ही सारी समस्या का हल है। इन्हीं दलीलों के सहारे झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बने थे। क्या इनके अलग होते ही इन राज्यों में तेजी से तरक्की होने लगी? पिछले पांच साल में झारखंड 8.75 परसेंट की रफ्तार से बढ़ा है जबकि बिहार जिससे अलग झारखंड बनाया गया, इसी दौरान 11 परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ा है। उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में भी विकास दर 8 परसेंट के करीब रही है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पांच सालों में देश में भी औसत विकास दर 8 परसेंट से ऊपर ही रही है। ऐसे में झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे खदान-संपन्न इलाकों का बढ़ना तो लाजिमी ही था। लेकिन उन आंकड़ों पर भी तो नजरें इनायत कीजिए जो बहुत अच्छी तस्वीर नहीं पेश करती हैं। पिछले पांच सालों में झारखंड और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के हमलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। हाल यह है कि देश में कुल नक्सली हमलों में 60 परसेंट से ज्यादा तो इन्हीं राज्यों में होते हैं। इन राज्यों में ट्राइबल आबादी विकास की धारा से अब भी गायब है। छत्तीसगढ़ में तीन चौथाई आबादी उन इलाकों में रहती है जहां कोई सड़क ही नहीं है। झारखंड का हाल भी बहुत बेहतर नहीं है। छत्तीसगढ़ एक मामले में खुशकिस्मत है कि वहां मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल पूरा हो पा रहा है। झारखंड के मुख्यमंत्रियों का हिसाब-किताब रखना पत्रकारों के लिए भी भारी मुसीबत है। यही नहीं, झारखंड के नेता करप्शन इंडेक्स में सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। छोटे राज्यों को देखकर मुझे तो यही लगता है कि राजनीति से इतर किसी खास उद्देश्य से अगर नए राज्य बनाए जाते हैं तो बात समझ में आती है, लेकिन छोटे राज्य बनाने की प्रक्रिया को ही जादू की छड़ी समझ लेना सही नहीं है। (लेखक सहारा मीडिया के एडीटर एवं न्यूज डायरेक्टर हैं)

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टिप्पणियाँ (2)


Mithilesh Chote rajyo ka nirman kahi se bhi vikash ka manak nhi ho sakta hai. eska sajiv example Jharkhand aur Uttrakhand hai ya north east ke rajya. dusre vrtman sandrbh me chote rahyo kee mang kuch aise rajnetao dwara kiya ja rha jo bhrtiya rajniti ke mainstream se alag- thalag hai, aur postive issues ke jagah pr aise muudo se apni jamin talashne ki kosish kr rhe hai, unko un predsh me CM kee Kurshi dikh rhi hai- jaise Ajit Singh - Harit Pradesh, Chandrsekhar Rao - Teleangana, Purvanchal, Bundelkhand. Chandrsekhar Rao ko India me jana jata hai- alag Telanagana state movement ke lie, otherwise unki identity development ya kisan majdoor ke lie kabhi nhai rhi.
manoj kumar dixitsir, apke lekh se mai sahmat hu. bakai chote rajyo se baat nahi banne baali hai. jab tak sahi niti nahi banaigi.
manoj kumar dixit 'samay'