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Published: Sat, 30 Jan 2010
जो चवन्नी-अठन्नी उत्तर प्रदेश के गांव से लेकर शहर में नहीं चलती थीं,सोचा शायद देश की राजधानी में चल जाएंगी।
पैसे-रुपये संग्रह करने की आदत सी बन गई है। सोचा था नहीं चलेगें तो एनटीक बन जाएंगे।
हमारे शुभचिंतक कहते हैं कि खोटे सिक्कों से आपकी खेलने की आदत हो गई है। लेकिन सिक्का कैसा भी हो चलन में जरुर रहेगा। आने से पूर्व जो दो-चार अठन्नी जेब में रह गई थीं यहां साथ में चली आईं।
सोचा किसका होता है। यहां के दूकानदार चवन्नी कम अठन्नी छोड़कर बैठे मिले। सिक्का कब खोटा निकल जाए, भरोसा नहीं।
लखनऊ में चवन्नी-अठन्नी कम होने पर टाफी पकडवा दी जाती थी। यहां तो चवन्नी दूर,अठन्नी लेने को तैयार नहीं कोई। अठन्नी का कोई खेल नहीं यहां,रुपये में होती है बात।
देश की राजधानी जो है।
आज कल दुकानदार के साथ ही जनता ने भी अठन्नी और चवन्नी जैसे छोटे सिक्कों को बेदखल कर दिया है। वैसे डॉलर के आगे चवन्नी-अठन्नी को कौन पूछता है।
अठन्नी-चवन्नी कम पर दूकानदार सामान देने में आना-कानी भी करते हैं। अधिकतर चूना ग्राहक को ही लग जाता है।
सच्चाई यह है कि अब भी चवन्नी और अठन्नी की कई चीजें बाजार में उपलब्ध हैं।
पहले भी दस-पांच के सिक्के मुंहजबानी बेदखल किए गए थे तो अखबार विक्रेता (हाकर) या डाकघर में सिक्के चल जाया करते थे।
भारत सरकार की ओर से कोई प्रतिबंध नहीं है। राजधानी के लोग भी इस सिक्कों की बेदखली से वाकिफ हैं।
बात राजकोट की है। मुझे वहां पर दो और पांच के नोट पालीथिन में स्टेपल मिले। मैने विरोध किया तो लेने के देने पड़ गए। समझाने लगे कि आप भारतीय मुद्रा का अपमान कर रहे हैं। लेकिन लौटने से पूर्व हम नोटों को चलाकर ही माने।
यहां तो न्यायपालिका,विधायिका व कार्यपालिका का मुख्यालय है,तब भी ऐसी बात हो तो अचरज है।
मुद्रा को अपमानित करना अपराध माना जाता है किन्तु बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे।
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