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Published: Sat, 30 Jan 2010
कभी भारत का सबसे कॉस्मोपोलिटन, सबसे इंटरनेशनल, सबसे प्रोग्रेसिव और समय के आगे नहीं तो हमेशा उसके साथ कदम मिला कर चलने वाला शहर होता था मुम्बई।
आज भी मुम्बई की आबोहवा में एक अजब ताजगी, उत्साह और उमंग है। आज भी यह महानगर भारत की आर्थिक राजधानी है। सबसे ज्यादा टैक्स मुम्बईकर ही देश के खजाने में जमा करते हैं। समुद्र किनारे बसे होने के कारण शहर के कुछ मध्यमवर्गीय सोच में अब भी एक खुलापन है। लड़कियां शायद ही भारत के किसी भी दूसरे शहर में इतनी महफूज महसूस करती हों जितनी मुम्बई में।
पर पिछले कुछ वर्षों में एक पारिवारिक कलह ने न सिर्फ मुम्बई बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीति में एक अलग सी होड़ को जन्म दिया है जिसमें मुम्बई की गंगा-जमुनी, कॉस्मोपोलिटन संस्कृति होम होती नजर आ रही है।
शिवसेना ने यूं तों हमेशा ही हिन्दू बनाम मुसलमान और मराठी बनाम गैर-मराठी की नकारात्मक राजनीति की और उसको अपने सियासी लाभ के लिए भुनाया भी। पर अपनी इस बांटने वाली बातों को भी उन्होंने एक लक्ष्मण रेखा में बांधकर रखने की कोशिश की। मौके-बेमौके अनेकों बार भर्त्सनीय हरकतें शिवसैनिकों ने कीं। मामला चाहे मुम्बई दंगों में उनकी भूमिका का हो, क्रिकेट पिच खोदने का हो, फायर जैसी फिल्मों के सार्वजनिक विरोध का हो या यदा-कदा वेलेनटाइन डे पर मॉरल पोलिसिंग का हो, कई बार इससे बाहर होने के बावजूद शिवसेना ने अपनी कुछ हद बनाये रखी थीं।
पर उद्धव और राज ठाकरे के बीच हुई राजनीतिक विरासत की जंग ने जैसे सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया है। सारे नियम-कायदे, मर्यादा की सीमाएं और राष्ट्रहित का मुखौटा तक उतार कर फेंक दिया है।
नतीजा यह है कि अब इन दो भाइयों की होड़ में एक के बाद एक आज की मुम्बई का प्रत्येक आधुनिक, लोकप्रिय और सही बात करने वाला नायक, ठाकरे बुंधुओं के जैसे निशाने पर हैं।
खेल शुरू किया राज ठाकरे ने। मराठी बनाम गैर-मराठी मामले को हिंसक हवा दी, माहौल को विषैला बनाया और भारत के सबसे बड़े शहर को जैसे बंदूक की नोक पर घुटने टिकवा दिये। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को उनकी राजनीतिक जगह दिखाने और आधिकारिक शिवसेना को कमजोर करने के लिए कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने राज ठाकरे का कमोवेश वही इस्तेमाल किया जो कभी कांग्रेस ने पंजाब में अकालियों से निबटने के लिए भिंडरावाले का किया था।
सरकारी शह पर राज ठाकरे ने कभी अमिताभ बच्चन तो कभी बिहारियों तो कभी सभी उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया।
उद्धव कुछ स्वभाव और सोच से शालीन रहे तो लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी निबट गई।
अब महाराष्ट्र में शिवसेना ने कुछ ‘जहर ही जहर को काटता है’ की तर्ज पर जो पलटवार राजनीति शुरू की है, उससे वह राज ठाकरे को निबटा पाएंगे या नहीं, यह तो अगले चुनावी नतीजे ही तय करेंगे, पर मुम्बई के सौहार्द और महानगरीय संस्कृति के पूरी तरह से निबट जाने के संकेत जरूर मिल रहे हैं।
और इस बहुत ही संकीर्ण, छोटे सोच की नकारात्मक राजनीति में सरकार कभी तो शुतुरमुर्ग की तरह अपना सर जमीन में गाड़ लेती है और ऐसा बर्ताव करती है कि उसे इन सब विवादों से कोई सरोकार है ही नही या फिर बीच-बीच में खुद भी एक पार्टी बन उस तरह के कायदे-कानून का पाठ गैर-मराठियों को पढ़ाने लगती है जैसे कुछ दिन पूर्व वहां के टैक्सी चालकों को मराठी अनिवार्य रूप से 15 दिन में सीखने कि बात कही गई थी। पर कांग्रेस तो दो कदम आगे बढ़ा चार वापस खींचने के राजनीतिक खेल में लंबे समय से माहिर है।
इन दिनों असल जहर उगल रहे हैं बाला साहब। कभी सचिन तेंदुलकर उनका निशाना होते हैं तो कभी मुकेश अंबानी। कभी शाहरूख को वह चुनौती भरे अंदाज में सचेत करते हैं और धमकाते हैं तो कभी उनके शालीन, मृदुभाषी पुत्र सैफ अली खान को टपोरी कह सार्वजनिक रूप से हड़काते हैं।
कोई भी समझदार इंसान जानता है कि दरअसल यह सब कुछ सियासत से ज्यादा और कुछ नहीं है। बाला साहब, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की लड़ाई में अमिताभ, सचिन, मुकेश, शाहरूख, सैफ इत्यादि सिर्फ मोहरा हैं।
पर इस ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’ की राजनीति में हमारा समाज एक ऐसे दलदल में फंसता जा रहा है जहां से अगर कभी निकलना नहीं हो पाया तो लेने के देने पड़ सकते हैं।
आप बताइए कब तक इस देश के समझदार और संजीदा लोगों के साथ इस तरह के राजनेता खिलवाड़ करते रहेगें। कब तक हम यह कह इन लोगों की बातों और धमकियों को नजरअंदाज करते रहेंगे कि अरे भई इन्हें गंभीरता से मत लीजिए...। इनका असली मकसद सिर्फ राजनीति है। यह सिर्फ सियासी नफा-नुकसान का हिसाब रख रहे हैं, सच में तो थोड़े ही किसी का अनहित चाहते हैं।
पर इस तरह के हमारी ‘चलता है’ सोच के कारण ही यह लोग हमें और हमारे समाज को धर्म, भाषा और प्रांतीयता के आधार पर बांटने में कामयाब हो रहे हैं। इन नेताओं के चाहने और न चाहने पर कृपया मत जाइए, नतीजे को देखिए। इनकी बातें और हरकतें हमारे समाज को जैसे स्लो प्वाइजन की तरह धीरे-धीरे मार रही हैं।
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