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(मुखाकृति वेबदैनिकी)
ranvijay singh
Upendra Rai
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भिखारियों के रुप अनेक प्रकाशित: Wed, 03 Feb 2010 at 18:24 IST (Ramesh Chandra) शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसका जिन्दगी की भागदौड में किसी भिखारी से सामना नहीं हुआ हो। इन भिखारियों में कुछ तो वास्तव में जरूरतमंद होते हैं और दो जून की रोटी के जुगाड के लिए मजबूरी की हालत में इधर-उधर भटकते रहते हैं तो कई ऐसे बनावटी भिखारी भी होते हैं,जो अंधे, गूंगे, कोढी और अपाहिज बनकर लोगों का सहानुभूति का फायदा उठाते हुए अच्छा खासा पैसा कमा लेते हैं। इन बनावटी भिखारियों के कुशल अभिनय के दम पर ही भीख मांगने का धंधा अभी तक चल रहा है। लेकिन यह भी तथ्य है कि लोगों से अच्छा खासा पैसा ऐंठने के बावजूद उन्हें इसमें से पारिश्रमिक के रूप में बेहद मामूली रकम मिलती है। दिन भर मेहनत से कमाए गए इनके पैसे का अधिकतर हिस्सा शाम को इनके ‘सरगना’ के पास पहुंच जाता है। भीख मांगना शायद इनकी मजबूरी है और इसी मजबूरी को इन्होंने धंधे में बदल दिया है। इस धंधे को लगातार चमकाने के लिए इन भिखारियों को नित नये तरीके भी ईजाद करने पडते हैं। भीख मांगने वालों में अच्छी खासी तादाद बच्चों की भी है। इन मासूम बच्चों के साथ कितनी क्रूरता का बर्ताव किया जाता है। इसकी एक झलक सोनू नाम के बच्चे से मिलती है। आठ वर्षीय सोनू ने बताया कि उसे बुखार होने पर भी भीख मांगनी पडती है और कई बार अच्छी कमाई नहीं होने पर शारीरिक यातना भी झोलनी पडती है। भरपेट भोजन की बात तो दूर रही, स्टेशनों पर यात्रियों से मिलने वाले रूखा-सूखा भोजन करके ही सोना पडता है। उसने बताया कि कई बार उसे सिगरेट से भी दागा गया लेकिन उसकी मजबूरी है कि उसे उन्हीं लोगों के साथ रहना है। वह कहता है कि अब तो उसका घर भी यही है और मां.बाप भी यही हैं। चाहकर भी वह उनसे दूर नहीं जा सकता। वह बताता है कि भाई लोगों के पुलिस से अच्छे संबंध होते हैं और उनसे वे बच्चों की पिटाई भी कराते हैं। पुलिस वाले उनके पास आते हैं,खाते-पीते हैं और उसके बाद अपना हिस्सा ले जाते हैं। सोनू ने बताया कि कुछ बच्चे भीख मांगने के साथ उठाईगीरी का काम भी करते हैं, जिसमें पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनके पकडे जाने पर वही उन्हें यात्रियों से बचाती है। दिल्ली से गाजियाबाद होते हुए जालंधर जाने वाली रेलगाडी में सोनू ने तमाम आपबीती बताई। यह कहानी केवल एक सोनू की नहीं बल्कि तमाम ऐसे सोनुओं की है, जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस दर्ज तो कर लेती है लेकिन ये बच्चे शायद ही अपने परिवार से मिल पाते हों। भीख मांगने वाले ये बच्चे छोटी उम्र में अनेक बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं। दारू. बीडी, ताश और तम्बाकू के अलावा उनके कई शौक बन जाते हैं। सोनू ने बताया कि बीडी पीना,जुआ खेलना आदि बुरी आदतें उसने दूसरे भिखारी बच्चों से सीखीं। वह बताता है कि सबसे पहले उसे (भाई) ने शराब पिलाई थी। इन बच्चों के भिखारी बनने का प्रमुख कारण गरीबी भी है। गिरोह के सदस्य गरीबी से जूझा रहे परिवार के पास जाते हैं और धन को प्रलोभन देकर उनके बच्चों को काम करने के लिए अपने साथ ले जाते हैं। ये बच्चे फिर शायद ही अपने घर वापस जा पाते हैं। कई बार अखबारों में पढने में आता है कि भूख से बेहाल मां ने दुधमुंहे बच्चे का सौदा किया। इन बच्चों को बडी निर्ममता से विकलांग बनाकर भीख मांगने के धंधे में धकेल दिया जाता है। इस धंधे में कहा जाता है कि बच्चा जितना खूबसूरत और मासूम होगा,उतना ही अच्छा पैसा मिलेगा। इन बच्चों की बदौलत सरगना को बैठे-बिठाए मोटी रकम मिलती है। इन भिखारी बच्चों को महानगरों के रेलवे स्टेशनों,बस अड्डों और मंदिरों के पास देखा जा सकता है। भीख मांगने के इनके अलग-अलग अंदाज होते हैं। लोगों की करूणा को जगाने के लिए कुछ अपने हाथ-पैरों पर सफेद पट्टी बांधकर उस पर लाल रंग का लेप कर लेते हैं तो कुछ अपने शरीर के कुछ हिस्सों पर इस तरह का लेप लगाते है,जिससे लगता है कि वे जल गए हैं। लोगों की दया पाने के लिए वे अपने उस ‘घाव’ को खुला रखते हैं। इस तरह के भिखारी मंदिरों या किसी खास चौराहे पर दिखाई दे जाते हैं। इन भिखारी बच्चों की मासूमियत से पसीजने वाले लोग इन्हें खाने की चीजों के साथ पैसा और कपडा भी दे देते हैं। भिखारियों के पेशे में लडकियां, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं। भीख मांगने वाली महिलाएं रेल या बस में बैठे यात्रियों की गोद में छपे-छपाए कार्ड रख देती हैं,जिनमें उन्हें गूंगी और बहरी बताया जाता है। कभी गांव में बाढ तो कभी सूखा और कभी आग में सब कुछ स्वाहा होने की कहानी बयां करते इन कार्डो में मदद की गुहार लिखी रहती है। लेकिन काम पूरा होने पर रेल और बस से उतरते ही उन्हें सब कुछ सुनाई देने लगता है और जुबान बोलने लगती है। बुजुर्ग बेचारे अपनी मामरिक वेदना प्रकट करते हुए आशीर्वचनों से मदद की गुहार लगाते हैं। उनकी याचनाओं से महिलाएं अधिक द्रवित हो जाती हैं। इन भिखारियों में कुछ तो सचमुच अंधे होते हैं और कुछ अंधे होने का नाटक करते हुए रेलगाडियों में भीख मांगते हैं लेकिन जैसे ही उनका स्टेशन आता है,झट कुलांचे मारते हुए उतर जाते हैं। तब यह ..चमत्कार.. देखकर यात्रियों के मुंह से यही निकलता है... पेट के लिए आदमी क्या-क्या जुगत नहीं करता। - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
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