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ट्रेन के डिब्बों की तरह शायरी का सफर:निदा फाजली



प्रकाशित: Sun, 11 Oct 2009 at 18:20 IST (Ramesh Chandra)

जन्मदिन 12 अक्तूबर पर विशेष
आम आदमी की जिंदगी के हर रिश्ते में से एक नज्म तलाशकर उसे लफ्जों में पिरोने वाले शायर निदा फाजली अपने अब तक के सफर को ट्रेन की तरह मानते हैं जिसमें फिल्मों के लिये आरक्षित डिब्बे भी हैं, जिंदगी के तजुर्बे और तसव्वुर के खाने भी हैं और शायरी पसंद करने वालों के लिये आम बोगी भी है।
‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें..किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये’ जैसी नज्म लिखने वाले शायर निदा फाजली अपनी जिंदगी के साठ बसंत देख चुके हैं।
बारह अक्तूबर को अपने जन्मदिन से पहले उन्होंने बातचीत में अपने शायरी के सफर के बारे में कहा कि मैं इसे ट्रेन के डिब्बों की तरह मानता हूं जिसमें फिल्म, आम पाठक और जाती जज्बात के लिये आरक्षित डिब्बे हैं। मैं हर डिब्बे की रचनात्मकता को उसी में बंद रखता हूं। जो आदमी जिस डिब्बे का होता है मैं उससे उसी का आदाब निभाता हूं। शेर..ओ..शायरी की रूह रचने में किस ख्याल से मदद मिलती है, इस पर वह कहते हैं, कि मैं भगवान बुद्ध के इस फलसफे पर यकीन रखता हूं कि जीवन में परिवर्तन यथार्थ है लेकिन परिवर्तन भी परिवर्तित होता है, यह उससे बड़ा यथार्थ है। लिहाजा, मैं आम आदमी और उसकी जिंदगी के यथार्थ को सबसे ज्यादा अहमियत देता हूं। वह आम आदमी ही होता है जिसका एक ही दायरा इंसानियत का और एक ही धर्म भूख का होता है। उसका खुदा भी एक ही होता है। अपनी अब तक की पसंदीदा नज्म कौन सी है, यह पूछने पर निदा कहते हैं, ‘यह किसी मां से कभी न पूछियेगा कि उसे कौन सा बच्चा सबसे प्यारा है। मेरे लिये सभी नज्में पसंदीदा हैं। कुछ मैंने पिता पर लिखी हैं, कुछ मां पर। इसका कारण यह है कि रिश्तों को मैंने तब खोया, जब जिंदगी में उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उनकी मां पर लिखी नज्म काफी मशहूर है, ‘बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां.. याद आती है चौका, बेसन, चिमटा, फुंकनी जैसी मां..बांस की खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे..आधी सोई, आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी मां..। भाषा के स्तर के लिहाज से उर्दू या हिंदी की क्या हालत है, इस पर वह बताते हैं, ‘समाज में जैसे एक से चेहरे नहीं होते, उसी तरह साहित्य में भी रास्ते एक जैसे नहीं होते। भाषा का संबंध व्यक्ति और उसके समाज से तय होता है। जैसा स्तर समाज का होगा, वैसा ही भाषा का होगा।’ खासकर उर्दू के बारे में वह कहते हैं, ‘हिंदूस्तान में एक उर्दू वह है जो कुर्सी पर हुक्म चलाती है और एक वह है जो सड़क पर पत्थर उछालते हुए दाग देहलवी बनाती है। भाषा का सवाल बहुत पुराना है। उर्दू साहित्य हो या हिंदी, हमारी पहुंच अब भी उन रास्तों तक नहीं है जहां आम जिंदगी जी जाती है। हमारे साहित्य में मध्यमवर्ग की कुंठा ही नजर आती है। एक समय था जब संत कबीर और संत तुकाराम जैसे लोग निकलकर आते थे। क्या कोई भाषाई विवाद नजर आता है, इस पर निदा राय रखते हैं कि मेरी नजर में हिंदू और उर्दू का अलग..अलग होना कोई मसला नहीं है। मेरा ख्याल है कि ये भाषाएं दो नहीं थीं, इन्हें दो बनाया गया। हम उस देश में रहते हैं जहां अमीर खुसरो भी एक अलग तरह की बोली बोला करते थे। ये दो भाषाएं अब राजनीति का खिलौना बन गयी हैं। दिल्ली में 12 अक्तूबर को जन्मे और फिर ग्वालियर में पले-बढ़े मुक्तिदा हसन निदा फाजली उर्दू के प्रख्यात शायर और गीतकार हैं। उनकी शायरी को किसी एक खांचे में नहीं रखा जा सकता क्योंकि उनकी नज्मों में जिंदगी के सभी पहलू नजर आते हैं।
उन्होंने वर्ष 1965 में मुंबई में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने ‘दीवारें के बीच’ और ‘मुलाकातें’ जैसी अनेक कृतियों से हिंदुस्तानी साहित्य को समृद्ध किया। वह साप्ताहिक पत्रिका ‘रस नटराज’ के संपादक भी रहे। ‘रजिया सुल्तान’ में कमाल अमरोही के जरिये उन्हें फिल्मी दुनिया में पहला मौका मिला।
वह राज कपूर की फिल्म ‘बीवी ओ बीवी’ के ‘तेरे लिये पलकों की झालर बुनूं’, ‘आप तो ऐसे न थे’ के ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में’ और ‘सरफरोश’ के ‘होश वालों को खबर क्या’ जैसे गीतों के चलते खासे मशहूर हुए।
जाने माने गजल गायक जगजीत सिंह और उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने भी निदा फाजली की कई नज्मों को आवाज दी है, जिनमें ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है’ और ‘सफर में धूप तो होगी, जो साथ चल सको तो चलो’ शामिल है। निदा खुसरो एवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी के बेहतरीन शायरी का एवार्ड, हिंदी उर्दू संगम पुरस्कार और वर्ष 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं।
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