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जब-जब मुसीबत छाई चुनाव-सुधारों की याद आई



प्रकाशित: Sun, 07 Feb 2010 at 16:36 IST (Ramesh Chandra)

लंदन से शिवकांत
पढ़ने में भले ही किसी फ़िल्मी गाने की पंक्ति जैसी लगे लेकिन यही कहानी है ब्रिटन की सत्ताधारी लेबर पार्टी की। लेबर पार्टी के नेता और ब्रिटन के प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन देश की सवा सौ साल पुरानी चुनाव प्रणाली में बदलाव करना चाहते हैं ताकि सभी सांसद अपने-अपने चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं के बहुमत या स्पष्ट जनादेश के साथ चुने जाएँ।
श्री ब्राउन का कहना है कि वे राजनीति को जनता तक ले जाना चाहते हैं। उसे पारदर्शी बनाना चाहते हैं ताकि जनता अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा कर सके। इस परिवर्तन के लिए श्री ब्राउन ने एक चुनाव सुधार विधेयक का प्रस्ताव रखा है जिस पर सांसदों को अगले सप्ताह मतदान करना होगा। इस विधेयक के पास हो जाने के बाद अगली सरकार प्रस्तावित नई चुनाव प्रणाली पर अक्तूबर 2011 तक एक जनमत संग्रह कराएगी। इस जनमत संग्रह में पास होने के बाद यह नई चुनाव प्रणाली लागू कर दी जाएगी। अभी तक ब्रिटन में आमचुनाव उसी प्रणाली से होते आए हैं जिस से भारत में। असल में भारत ने ब्रिटन की चुनाव प्रणाली को ही अपनाया है। इसके अंतर्गत अपने चुनाव क्षेत्र में सबसे अधिक वोट हासिल करने वाले उम्मीदवार को उस चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधि या सांसद चुन लिया जाता है। यह प्रणाली सरल होने के साथ-साथ चुने जाने वाले सांसद का अपने चुनाव क्षेत्र के साथ नज़दीकी संबन्ध भी क़ायम रखती है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि इसमें उम्मीदवार, डाले गए कुल वोटों का बहुमत यानी 50% हासिल किए बिना भी जीत सकता है और तिकोने, चौकोने या उससे भी अधिक कोण वाले मुक़ाबलों में अक्सर लोग 25-30% वोट लेकर भी जीत जाते हैं। इतने कम मतों से चुने गए सांसदों को बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं माना जा सकता। ऊपर से ब्रितानी चुनाव प्रणाली वाले भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्रों में अल्पमत से चुने जाने वाले सांसदों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है जो किसी भी प्रतिनिधि लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। इसीलिए ब्रितानी प्रधानमंत्री ने अपनी मौजूदा चुनाव प्रणाली की जगह एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली को अपनाने का प्रस्ताव रखा है। एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली में मतदाता किसी एक उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाने की बजाए उम्मीदवारों के नामों के आगे 1, 2, 3, 4 आदि अंक लगाकर अपनी प्राथमिकता व्यक्त करता है। वोटों की गिनती के समय सबसे पहले उम्मीदवारों को मिली पहली प्राथमिकताओं की गिनती की जाती है। अगर किसी उम्मीदवार को डाले गए वोटों में से 50% से अधिक पहली प्राथमिकता वाले वोट मिल जाते हैं तो वह सीधे चुन लिया जाता है। अन्यथा, सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को चुनाव से हटा कर उसके वोटों की दूसरी प्राथमिकताओं को बचे हुए उम्मीदवारों में बाँट दिया जाता है। सबसे कम वोट वाले उम्मीदवारों को चुनाव से हटाने और उन्हें बचे हुए उम्मीदवारों बाँटने का क्रम तब तक जारी रहता है जब तक किसी एक उम्मीदवार के वोट 50% नहीं हो जाते और उसे फिर विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस प्रणाली की ख़ासियत यह है कि प्रत्येक विजयी उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र के बहुमत का प्रतिनिधित्व करता है क्यों कि वह कम से कम 50% वोट लेकर जीतता है। एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली ऑस्ट्रेलिया और फ़िजी जैसे देशों के संसदीय और आयरलैंड के राष्ट्रपतीय चुनावों में प्रचलित है। जहाँ तक ख़ामियों की बात है, एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली में वे सारी ख़ामियाँ मौजूद हैं जो ब्रिटन और भारत की वर्तमान चुनाव प्रणालियों में हैं।
इनकी सबसे बड़ी ख़ामी तो यही है कि पार्टियाँ आमचुनाव में डाले गए कुल वोटों के आधे से कम वोट लेकर भी संसद की आधी से अधिक सीटें जीत लेती हैं और पूर्ण बहुमत के दावा करती हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटन में कुल 17 आमचुनाव हो चुके हैं और जीतने वाली पार्टियाँ संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल करने के बावजूद एक बार भी 50% वोट या वोटों का बहुमत हासिल नहीं कर पाई हैं।
इसके विपरीत कई बार ऐसा हो चुका है कि कम वोट पाने वाली पार्टी को संसद में अधिक वोट पाने वाली पार्टी के मुक़ाबले ज़्यादा सीटें मिली हैं। इसकी सबसे प्रसिद्ध मिसाल 1951 का आमचुनाव था जिसमें विन्स्टन चर्चिल की कंज़र्वेटिव पार्टी को लेबर पार्टी से कम वोट मिले थे लेकिन इसके बावजूद वह लेबर पार्टी से 26 सीटें अधिक जीतकर सत्ता में आ गई थी।
दूसरी बड़ी ख़ामी यह है कि चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार कौन बनेगा इसका फ़ैसला पार्टियाँ करती हैं। मतदाता का इसमें कोई दख़ल नहीं है। इसके चलते नेताओं के भाई-भतीजों के अलावा पता नहीं कैसे-कैसे लोगों को पार्टियों के टिकट मिल जाते हैं। ब्रिटन में भारत जैसा हाल तो नहीं है लेकिन फिर भी उम्मीदवार मतदाताओं की आशाओं के अनुरूप हों यह ज़रूरी नहीं है। बहरहाल, ब्रिटन की विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी ने प्रधानमंत्री के चुनाव सुधार प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए इसे “मृत्यु शय्या पर लेटे व्यक्ति के हृदय परिवर्तन” की संज्ञा दी है। एक लंबे अरसे से चुनाव सुधारों की माँग करती आ रही लिबरल पार्टी ने भी इस का मज़ाक उड़ाते हुए इसे “सही दिशा में उठाया गया एक छोटा सा क़दम” और बेकार का सुधार कहा है। प्रधानमंत्री के अपने मंत्रिमंडल और लेबर पार्टी के भीतर भी चुनाव प्रणाली में सुधार के इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद हैं। इस प्रस्ताव पर अगले साल जनमत संग्रह होगा जबकि आमचुनाव इसी साल की मई तक होने हैं। इसलिए इस बात की आशंका है कि अगले सप्ताह कुछ लेबर सांसद भी इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट डालें। सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन को इस समय आमचुनाव के सिर पर आ जाने पर ही चुनाव सुधार की बात क्यों याद आई है और सुधार के लिए उन्होंने एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली को ही क्यों चुना है? आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली को क्यों नहीं जो योरोपीय संघ के लगभग सभी देशों में किसी न किसी रूप में प्रचलित है? श्री ब्राउन की लेबर पार्टी के संस्थापक कीर हार्डी भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने 1913 के लेबर पार्टी घोषणा पत्र में कहा था, “जो भी चुनाव प्रणाली सभी पार्टियों को उन्हें मिलने वाले वोटों के अनुपात में प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं देती उसे संतोषजनक चुनाव प्रणाली नहीं माना जा सकता।“ श्रीमती थैचर के नेतृत्व में कंज़र्वेटिव पार्टी से तीसरी बार चुनाव हार जाने के बाद सन 1988 में लेबर पार्टी के शक्तिशाली चार्टर 88 गुट के सांसदों ने एक बार फिर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की माँग उठाई थी।
लेबर नेता टोनी ब्लेयर ने 1997 के ऐतिहासिक आमचुनाव के घोषणापत्र में चुनाव सुधारों का वादा किया था लेकिन लेबर पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद उस वादे को केवल एक आयोग बिठा कर टाल दिया गया। उत्तर साफ़ है। लेबर पार्टी को चुनाव के मैदान में जब-जब हार नज़र आती है, तब-तब चुनाव सुधार याद आ जाते हैं। 1913 में लेबर पार्टी एक छोटी पार्टी थी और लिबरल पार्टी के जनाधार में सेंध लगा कर अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही थी। इसलिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की वकालत करना समय की माँग थी। आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बड़ी सारी ख़ूबियों में सबसे अहम ख़ूबी यह है कि इससे बड़ी पार्टियों को सबसे बड़ा नुकसान और छोटी पार्टियों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता है। मिसाल के तौर पर पिछले आमचुनाव में लिबरल पार्टी ने 22% से ज़्यादा वोट हासिल किए थे लेकिन संसद में उसे केवल 9.5% सीटें ही मिल पाई थीं। इसीलिए लेबर पार्टी ने अपने आरंभिक दिनों में तो चुनाव सुधारों के नाम पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व की माँग उठाई लेकिन जनाधार फैलने और देश की दो बड़ी पार्टियों में गिनती होने के साथ ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व की माँग को भुला दिया केवल चुनाव सुधार का मंत्र जपना जारी रखा और वह भी चुनावों में हार के नज़र आने पर। इसीलिए 1997 में भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद अपने 13 साल लंबे शासन काल में लेबर पार्टी ने चुनाव-सुधारों पर मुँह नहीं खोला। एक बार फिर, आमचुनाव सिर पर हैं और सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री ब्राउन की लेबर पार्टी विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी से कम से कम 10% पीछे चल रही है। बेरोज़ग़ारी की दर 8% तक पहुँच गई है और अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट की मार से उबर नहीं पाई है। बैंकों को बचाने में ख़ज़ाना खाली हो जाने के बाद अब बजट घाटे को कम करने के लिए नागरिक सेवाओं में कटौती करनी होगी, कर बढ़ाने होंगे और ब्याज दरें बढ़ेंगी। लोग देश को इराक की लड़ाई में झोंकने और अफ़ग़ानिस्तान की लड़ाई से रोज़-रोज़ मिलने वाली सैनिकों की मौत की ख़बरों से भी नाराज़ हैं। ऊपर से संसदीय कामकाज में होने वाले ख़र्चे के नाम पर नियमों को तोड़-मरोड़ कर और जाली रसीदें बनवा कर सरकार से पैसा ऐंठने के कई सांसदों के कारनामे ने संसद की छवि धूमिल कर रखी है। इस घोटाले की छानबीन करने वाले आयोग ने पिछले सप्ताह ही चार सांसदों पर जालसाज़ी और ग़बन का मुकद्दमा चलाने की सिफ़ारिश की है। इनमें से तीन सांसद सत्ताधारी लेबर पार्टी के हैं। इस घोटाले के चलते अभी तक 133 सांसदों ने अगले आमचुनाव में खड़े न होने का फ़ैसला किया है ताकि संसद की छवि को बहाल किया जा सके। प्रधानमंत्री को इस समय चुनाव-सुधार याद आने का यह एक बड़ा कारण है। वे चुनाव में लेबर पार्टी को सुधारवादी पार्टी के रूप में पेश करना चाहते हैं और विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी पर सुधार विरोधी और वंशवादी पार्टी का लेबल लगाना चाहते हैं। लेकिन लगता है कि प्रधानमंत्री को स्वयं अपनी जीत का भरोसा नहीं है। हाँ, उन्हें इतनी आशा अवश्य है कि बहुमत कंज़र्वेटिव पार्टी को भी मिलने वाला नहीं है। इसलिए वे लिबरल पार्टी को रिझा कर एक गठबंधन सरकार की आधारभूमि तैयार करना चाहते हैं। लिबरल पार्टी एक लंबे अरसे से चुनाव प्रणाली में सुधार की और आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू करने की माँग करती आई है। प्रधानमंत्री ब्राउन का एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली का प्रस्ताव आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव न सही लेकिन मौजूदा प्रणाली में बदलाव करने का प्रस्ताव अवश्य है इसलिए लिबरल पार्टी के लिए इसे पूरी तरह ठुकराना संभव नहीं होगा और किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने की सूरत में लिबरल पार्टी को लेबर की तरफ़ झुकाने के लिए पर्याप्त होगा। अगर ऐसा हुआ तो युद्धोत्तर ब्रितानी इतिहास हैरल्ड विल्सन की लेबर सरकार के बाद यह दूसरी गठबंधन सरकार होगी।
आलोचकों का कहना है कि हार की रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतरना प्रधानमंत्री ब्राउन को उल्टा भी पड़ सकता है। जनता लेबर पार्टी के न जीतने की आशंका और एक मज़बूत सरकार की आशा में डेविड कैमरन की कंज़र्वेटिव पार्टी को भी स्पष्ट जनादेश दे सकती है। उस सूरत में प्रधानमंत्री का चुनाव सुधार का प्रस्ताव एक बार फिर प्रस्ताव ही बन कर रह जाएगा क्यों कि कंज़र्वेटिव पार्टी उसे रद्दी की टोकरी में डालने की घोषणा पहले ही कर चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटन में ही उत्तरी आयरलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स की प्रांतीय एसेंबलियों के चुनाव तथा लंदन के मेयर का चुनाव वैकल्पिक चुनाव प्रणाली और आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को मिला-जुला कर बनाई गई चुनाव प्रणालियों से होता है। लेकिन संसद की चुनाव प्रणाली में जब भी बदलाव का प्रस्ताव आया है, रद्दी की टोकरी की भेंट चढ़ गया है। सुधारों का पहला प्रस्ताव 1917 में लिबरल पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज ने रखा था जिसे संसद के वरिष्ठ सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने पास नहीं किया क्यों कि वरिष्ठ सदन एक और बेहतर प्रणाली को लागू करना चाहता था। उसके बाद 1929 में प्रधानमंत्री रैम्सी मैकडॉनल्ड ने इसी एवी या वैकल्पिक चुनाव प्रणाली लागू करने का प्रस्ताव रखा था जिसे कंज़र्वेटिव पार्टी के सांसदों ने नहीं पास होने दिया था। क्या तीसरी बार संसद के चुनाव सुधारों के प्रयास सफल हो पाएँगे? इसका जवाब अब उन मतपेटियों से मिलेगा जो मई के आमचुनाव के बाद खोली जाएँगी। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो भारत उन इने-गिने देशों में रह जाएगा जहाँ ब्रिटन की सवा सौ साल पुरानी संसदीय चुनाव प्रणाली चल रही होगी।
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