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चीन-अमरीका विवादः कितना दिखावटी,कितना असली



प्रकाशित: Fri, 05 Feb 2010 at 19:07 IST (Ramesh Chandra)

लंदन से शिवकांत
पिछले नवंबर की ही बात है जब अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा चीन की राजकीय यात्रा पर गए थे। यात्रा के अंत में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, “हम ऐसे समय पर मिल रहे हैं जब कि हम सभी के भविष्य के लिए चीन और अमरीका के रिश्तों का महत्त्व इससे बढ़कर कभी नहीं था।“
राष्ट्रपति ओबामा ने चीन की विस्मयकारी आर्थिक उन्नति की दिल खोल कर सराहना की थी और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बड़ी भूमिका निभाने की चीन की कोशिशों का स्वागत किया था। अमरीका और चीन की संयुक्त विज्ञप्ति में भारत का ज़िक्र केवल दक्षिण एशिया के संदर्भ में देख कर भारत के कुछ कूटनीति के पंडितों को चिंता सताने लगी थी कि कहीं भारत के साथ अमरीका के रिश्ते चीन और अफ़ग़ान-पाकिस्तान के दो पाटों के बीच पिस कर तो नहीं रह जाएँगे। लेकिन दो महीनों के भीतर ही अमरीका और चीन के रिश्ते दूध की तरह फटते दिखाई दे रहे हैं।
बुधवार की रात को राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी के सेनेटरों की एक सभा में कहा था कि वे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों का पालन करवाने के लिए चीन और दूसरे देशों पर दबाव डालते रहेंगे और उन देशों के साथ सख़्ती से पेश आएँगे जो अपनी मुद्रा के मूल्य को डॉलर के मुक़ाबले जान-बूझकर नीचा रख रहे हैं ताकि उनका माल सस्ता रहे और व्यापार बढ़ता रहे। राष्ट्रपति ओबामा के निशाने पर चीन की मुद्रा युवान थी। अमरीका का आरोप है कि चीन ने जान-बूझ कर युवान के मूल्य को उसके बाज़ार मूल्य से 20-25% नीचे रखा हुआ है। इसकी बदौलत अमरीका को चीन के साथ व्यापार में प्रतिवर्ष 200 से 250 अरब डॉलर का घाटा उठाना पड़ता है और चीन का विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़कर इस साल 24 खरब डॉलर हो गया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मा जाओशू ने अगले ही दिन, बृहस्पतिवार को राष्ट्रपति ओबामा के बयान का खंडन करते हुए कहा कि “युवान का मूल्य इस समय अपने सही और संतुलित स्तर के आसपास है।“ चीनी प्रवक्ता ने कहा कि चीन के साथ अमरीका के व्यापार घाटे की असली वजह युवान की क़ीमत नहीं है। इसलिए दोनों देशों का भला इसी में है कि एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाए व्यापार बढ़ाने में सहयोग दें। लेकिन चीन को असली ताव राष्ट्रपति ओबामा की दलाई लामा से मिलने की घोषणा और ताइवान को 6.6 अरब डॉलर के हथियार बेचने की घोषणाओं पर आया है।
तिब्बत को चीन अपना अंग मानता है और दलाई लामा को एक अलगाववादी। राष्ट्रपति ओबामा ने अपनी चीन यात्रा से पहले पिछले अक्तूबर में दलाई लामा से मिलने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया था। लेकिनि यात्रा के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति हू जिंताओ से आग्रह किया कि लगभग 15 महीनों से बंद पड़ी तिब्बत वार्ताओं को फिर से शुरू कराएँ। चीन ने अमरीका की बात रखते हुए दलाई लामा के प्रतिनिधियों के साथ जनवरी के अंत में बातचीत की और शुरू में कुछ ऐसे संकेत भी मिले थे कि शायद चीन अपनी तिब्बत नीति में कुछ नरमी दिखाए। लेकिन चीन ने ऐसा कुछ नहीं किया और तिब्बत पर चीनी प्रभुसत्ता को स्वीकार करते हुए स्वायत्तता की दलाई लामा की माँगों को भी ठुकरा दिया। इसके तुरंत बाद ही अमरीका से ख़बर आई कि राष्ट्रपति ओबामा इस महीने दलाई लामा से मिलने वाले हैं। इस पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी जू वाइचुन ने चेतावनी दी कि अगर अमरीका के राष्ट्रपति इस समय दलाई लामा से मिलते हैं तो इससे चीन और अमरीका के बीच बना विश्वास और सहयोग ख़तरे में पड़ सकता है।
इस के जवाब में अमरीकी राष्ट्रपति के प्रवक्ता बिल बर्टन ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक नेता के रूप में दलाई लामा का पूरी दुनिया में आदर है। इसीलिए राष्ट्रपति ओबामा उन से मिलेंगे और इसकी सूचना उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान ही चीनी नेताओं को दे दी थी। चीन की आपत्तियों के बावजूद अमरीका के राष्ट्रपति दलाई लामा से पहले भी मिलते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार यह मुलाक़ात ऐसे समय हो रही है जब चीन ताइवान को हथियार बेचने के अमरीका के फ़ैसले से नाराज़ है। ताइवान को चीन अपना एक रूठा हुआ प्रांत मानता है और दावा करता है कि उसे ताइवान पर प्रभुसत्ता जमाने का अधिकार है। इसलिए कोई ताइवान की प्रभुसत्ता को मान्यता दे या फिर उसे हथियार बेचे यह बात उसे फूटी आँख नही सुहाती। अमरीका इतना तो मानता है कि ताइवान स्वतंत्र देश नहीं बन सकता लेकिन यह दावा भी करता है कि उसे उस की रक्षा करने का अधिकार है। रक्षा के इसी अधिकार को जताते हुए अमरीका ताइवान को केवल आत्मरक्षा के हथियार बेचता है।
ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच यह एक प्रकार की लक्ष्मण रेखा है जिसे अमरीका ने इस बार भी पार नहीं किया है। ताइवान को दिए जाने वाले 6.6 अरब डॉलर के हथियारों में दुश्मन के प्रक्षेपास्त्रों से बचाव करने वाले पैट्रियट रक्षा प्रक्षपास्त्र, ब्लैक हॉक हैलीकॉप्टर और जहाज़ भेदी हारपून प्रक्षेपास्त्र शामिल हैं। फिर भी चीन ने कड़े तेवर दिखाते हुए अमरीका के साथ सैनिक आदान-प्रदान बंद करने, अहम मुद्दों पर सहयोग के बारे में पुनर्विचार करने और लॉकहीड मार्टिन तथा बोइंग समेत उन अमरीकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है जो ताइवान को हथियार बेचने वाली हैं। अमरीका ने हथियार बेचने के फ़ैसले की पैरवी करते हुए कहा है कि इससे चीन और ताइवान के बीच सुरक्षा और स्थिरता क़ायम होगी। इससे पहले अमरीकी इंटरनेट कंपनी गूगल ने अपने इमेल खातों में सेंध लगाने की कोशिशों की शिकायत करते हुए चीन में अपना कारोबार बंद करने की धमकी दी थी।
गूगल का कहना था कि चीन में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के इमेल खातों में सेंध लगाने की कोशिशें की गई हैं। अमरीका विदेशमंत्री हिलरी क्लिंटन ने गूगल की हिमायत लेते हुए चीन से इन आरोपों की छानबीन कराने की माँग की थी और चीन को सेंसरशिप के ज़रिए सूचना के प्रवाह का गला न घोंटने की नसीहत दी थी। इस बयान पर भी चीन ने तीख़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चीन के ख़िलाफ़ बेबुनियाद आरोप न लगाने को कहा था। चीन का कहना था सरकार का इमेलों में सेंध लगाने में कोई हाथ नहीं है। चीन और अमरीका के बीच इस तरह की बयानबाज़ी कोई नई बात नहीं है। नब्बे के दशक में यह एक आम बात थी। मानवाधिकारों के हनन, तिब्बत के दमन, आस्था और अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता जैसे विषयों पर चीन की आलोचनाएँ होती रहती थीं। लेकिन पिछले दशक में और विशेषकर पिछले चार-पाँच वर्षों के दौरान चीन और अमरीका के रिश्तों में एक नई गर्मी दिखाई देने लगी थी और आलोचनाओं के स्वर धीमे पड़ गए थे। ऐसे में राष्ट्रपति ओबामा की चीन यात्रा के दो महीनों के भीतर एक-साथ चार-पाँच बड़े विवादों का छिड़ जाना महज़ इत्तेफ़ाक़ माना जाए या फिर दुनिया की एकछत्र सैनिक महाशक्ति अमरीका और एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति चीन के बीच किसी नए शीतयुद्ध की शुरुआत? चीन के कुछ अमरीका विशेषज्ञों का मानना है कि यह दिनोंदिन प्रबल होते जा रहे चीन को क़ाबू में रखने के लिए अमरीका की नई “सोफ़्ट वार” या नरम युद्ध की नीति है। इन विशेषज्ञों का कहना है कि अमरीका और उसके मित्र देश आर्थिक संकट और इराक युद्ध की मार से खोखले हो चुके हैं इसलिए आर्थिक महाशक्ति बन कर उभरे चीन को सैनिक और आर्थिक शक्तियों से तो क़ाबू में कर नहीं सकते। इसलिए अपनी मानवाधिकार, पारदर्शिता और लोकतंत्र की “सोफ़्ट” या नरम ताकत से नैतिक दबाव बना कर उसे क़ाबू में रखना चाहते हैं। कुछ समीक्षक इसे “स्मार्ट वार” या चतुर युद्ध की संज्ञा भी दे रहे हैं। ब्रिटन के चीन विशेषज्ञों का मानना है कि अमरीका और चीन का विवाद महज़ दिखावटी विवाद है जिसे दोनों देश अपनी-अपनी जनता को ख़ुश रखने के लिए नाप-तोल के साथ खेल रहे हैं। इसकी शुरुआत राष्ट्रपति ओबामा की चीन यात्रा से पहले ही हो चुकी थी जब अमरीका ने चीन से आयात होने वाले तेल के कूओं के स्टील के पाइपों और टायरों पर भारी शुल्क लगाकर अपनी कंपनियों को ख़ुश करने की कोशिश की थी। ओबामा की चीन यात्रा के बाद कोपनहेगन के जलवायु सम्मेलन में भी दोनों देश दुनिया के भविष्य को बचाने की बजाए अपने-अपने देशों जनमत के इशारों पर चलते रहे। उस के बाद गूगल, दलाई लामा, ताइवान और युवान की क़ीमत समेत सारे विवादों को इसी आलोक में देखा जा सकता है। अमरीका और चीन की पारस्परिक निर्भरता को देखते हुए यह बात तर्कसंगत भी लगती है। क्यों कि चीन इस समय अमरीका का सबसे बड़ा साहूकार है और अमरीका चीन का सबसे बड़ा कर्ज़दार। दोनों की स्थिति हिंदी फ़िल्मों के ऐय्याश ठाकुर साहब और शातिर साहूकार जैसी है। अमरीका की अर्थव्यवस्था अभी आर्थिक संकट से पूरी तरह नहीं उबर पाई है। उसमें जान डालने के लिए अमरीका को अपनी ब्याज दरें नीची रखने की ज़रूरत है। लेकिन अमरीका का ख़ज़ाना इस वक़्त खाली है।
इस साल का बजट घाटा 15 खरब डॉलर से ऊपर चला गया है। ऐसे में अमरीका को अपनी प्रतिभूतियाँ बेच कर सस्ती दरों पर उधार लेना पड़ेगा। सस्ती दरों पर उधार वही दे सकता है जिसके पास ढेर सारे डॉलर हों और जिसे सौदे में कुछ फ़ायदा नज़र आता हो। इस समय चीन ही एक ऐसा देश है जिसके ख़ज़ाने में विदेशी मुद्रा के अंबार लगे हैं। चीन अमरीका को अब तक 800 अरब डॉलर का कर्ज़ दे चुका है और डॉलर के मूल्य को लेकर उठने वाली सारी आशंकाओं के बावजूद अमरीका को हर समय कर्ज़ देने को तैयार रहता है। क्यों कि अमरीका चीन के माल का सबसे बड़ा ख़रीदार है और एक अच्छा साहूकार बड़ी आसामी को उधार पर भी मनचाहा माल देने को तैयार रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो युवान की क़ीमत को लेकर या एकाध कंपनियों को लेकर दोनों देशों के बीच होने वाली बयानबाज़ी या शुल्क थोपना किसी नाटक से अधिक कुछ नहीं जान पड़ता। चीन को डॉलर के गिरते मूल्य को लेकर ज़रूर चिंता हुई थी लेकिन अब वह भी नहीं है। रही युवान के मूल्य की बात। तो चीन को भी पता है कि उधार पर चलने वाला अमरीका जले-भुने बयानों से आगे कुछ करने की स्थिति में नहीं है।
जहाँ तक दुनिया की कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं का प्रश्न है, वहाँ भी चीन के सहयोग के बिना अमरीका कुछ ख़ास करने की स्थिति में नहीं है। भले ही वह जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ठोस और कारगर क़दम उठाने का मुद्दा हो, इरान और उत्तरी कोरिया के परमाणु कार्यक्रमों पर अंकुश लगाने का या फिर दुनिया की अर्थव्यवस्था में विकास की गति को बनाए रखने का। हर मामले में चीन के सहयोग की ज़रूरत है। ऐसे में यदि अमरीका वाकई लोकतांत्रिक सुधारों को बढ़ावा देते हुए चीन को एक ज़िम्मेदार महाशक्ति के रूप में उभरते देखना चाहता है तो उसे अपनी नीतियों पर नए सिरे से सोचना होगा।
चीन को सीधे नसीहत देने की बजाए किसी ऐसी नई महाशक्ति को उसकी प्रतिस्पर्धा में भी तो ला खड़ा किया जा सकता है जिसकी राजनीतिक व्यवस्था अमरीका के अपने लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों से मेल खाती हो। जिसका चीन पर सुधारों के लिए परोक्ष रूप से दबाव पड़ सके। भारत इस भूमिका को बख़ूबी निभा सकता है।
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