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(मुखाकृति वेबदैनिकी)
Upendra Rai
Ravi Vaish
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गांधीजी से प्रभावित हो समाजसेवा में उतरे बाबा आम्टे प्रकाशित: Mon, 08 Feb 2010 at 12:39 IST (Ramesh Chandra) पुण्यतिथि नौ फरवरी पर विशेष संपन्न परिवार में पैदा हुए मानवतावादी बाबा आम्टे ने अपने सादगीपूर्ण जीवन तथा सामाजिक कार्यों से समाज सेवा की धारणा को जहां नया आयाम दिया वहीं विस्थापितों के हक के लिए जनांदोलन से भी जुड़े और उस दौर में कुष्ठ रोगियों की सेवा शुरू की जब ऐसे मरीजों को समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। महाराष्ट्र के वर्धा जिले में 26 दिसंबर 1914 को एक संपन्न परिवार में पैदा हुए मुरलीधर देवीदास आम्टे यानी बाबा आम्टे का जीवन वकील के रूप में शुरू हुआ। वकील के रूप में उनका करियर सफलतापूर्वक चल रहा था लेकिन वह जल्दी ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार नेताओं के मुकदमों की पैरवी की। उन्होंने कुछ समय महात्मा गांधी के आश्रम सेवाग्राम में भी बिताया और जल्दी ही गांधी के अनुयायी हो गए। उन्होंने वंचित और मुसीबत में फंसे लोगों की मदद के अलावा खादी पहनने तथा चरखा कातने की आदत बना ली। बाबा आम्टे,महात्मा गांधी के कार्य से प्रभावित होकर समाज सेवा के क्षेत्र में आए जहां उन्होंने अपने सादगीपूर्ण जीवन और कार्यों से बहुतों को आकर्षित किया। उनका सामाजिक कार्य ’अपीलिंग’ होने लगा। लोगों पर उनके प्रभाव का बेहतरीन उदाहरण उनकी ’भारत जोड़ो’ यात्रा थी। उन्होंने जब यात्रा शुरू की तो बड़ी संख्या में लोग आगे आए। बाबा आम्टे महात्मा गांधी से प्रभावित हुए और खुद अपने सादगी भरे जीवन से लोगों को आकर्षित किया। समाज जब कुष्ठ रोगियों से घृणा करता था, उन्हें अपने साथ रहने नहीं देना चाहता था, तब महात्मा गांधी के विचारों का अनुसरण करते हुए बाबा आम्टे आगे आए और इस दिशा में बेहतरीन काम किया। कुष्ठ के क्षेत्र में काफी काम करने के बाद वह जनांदोलन से जुड़े। वह नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े और आश्रम बनाकर वहां काफी दिनों तक रहे। बाबा आम्टे रचनात्मक कार्य के साथ आंदोलन से भी जुड़े और एक पीढ़ी को प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा से काफी लोग आगे आए। बाबा आम्टे के सफर में उनकी पत्नी साधना भी लगातार साथ रहीं और उन्होंने सामाजिक कार्यों में अपने पति का हमेशा साथ दिया और साधना ताई के नाम से मशहूर हुई। बाबा आम्टे ने आनंदवन सहित तीन आश्रम बनाए जो कुष्ठ मरीजों, अशक्तों और वंचित तबकों के लोगों के कल्याण के लिए थे। पूरा जीवन सामाजिक कार्यों में लगा देने वाले बाबा आम्टे ने पारिस्थतिकी तंत्र और वन्य जीवन संरक्षण की दिशा में जागरूकता के क्षेत्र में भी सराहनीय काम किया। बाद में वह नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े और परियोजना से विस्थापित लोगों का मुद्दा उठाया। बाबा आम्टे ने कुष्ठ मरीजों की सेवा उस दौर में शुरू की थी जब समाज में ऐसे रोगियों को हेय नजर से देखा जाता था और उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता था। बाबा आम्टे ने इस समस्या को समझाते हुए नया रास्ता दिखाया और साबित किया कि यह रोग संक्रामक नहीं है जैसा कि उस समय के लोगों में मान्यता थी। सामाजिक कार्य के लिए पद्म विभूषण के अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार, रेमन मैगसेसे पुरस्कार सहित दर्जनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित बाबा आमटे का नौ फरवरी 2008 को निधन हो गया। उनके पुत्र और परिवार के सदस्य उनके अधूरे कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं और विभिन्न तरीकों से सामाजिक कल्याण के लिए जुटे हुए हैं - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
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